नीली सड़क..

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(तस्‍वीर को बड़ाकार देखने के लिए तस्‍वीर पर चूहा ले जाकर उसे नये टैब में खोलें.)

 

गीक..

No Comment - लजाइये नहीं, टिपियाइये



फेसबुक पर विनय का पोस्‍टेरस डॉट कॉम का एक इबो (ओगो, सोत्‍ती?) लिंक दिखा, पुरानी आदत के मारे, मुफ़्ति‍या माल दिखते ही तड़ देना हम जेब में साटे उड़ लिये.

(तस्‍वीर को बड़ाकार देखने के लिए तस्‍वीर पर चूहा ले जाकर उसे नये टैब में खोलें.)

 

‘देह का सत्‍य-तत्‍व कहां बसता है, प्रभु? और अंधेरे वन में अंधेरी आंख, कैसे तकती है?’ कल्‍पना के जापानी मांगाओं में उलझे ऋषिपुत्र सुकुमार तपोधन विशाखकुसुम प्रश्‍न करें, व प्रश्‍नोपरांत लम्‍बी सांस लेने का अवकाश टटोल रहे ही हों, कि जो साक्‍को की ग्राफ़ि‍क कथा ‘गोरात्‍ज़े’ की शांत घाटियों में एक बार फिर सर्ब सर्वनाशी हरमख़ोर मशीनी बंदूकों की बेशरम शोर कांपती तड़तड़ाहट गूंजने लगे, धुंधलके के बगूलों में ‘तड़-तड़-तड़-तड़..’ की तान छूटे, देर तक कहीं कुछ उखड़ता, दरकता, टूटता रहे. दूर तक.

राममनोहर लोहिया के जाति व इतिहास-चक्र से अनजान, अर्ल लवलेसनमक’ के रास्‍ते अपनी जातीय पहचान के दिशाहारेपन में देश का बिगड़ा नसीब क्‍यों है कैसे है का नोट लेते उस बिखराव को संवारने निकलें, और आगे जाकर कहीं किन्‍हीं दूसरे धुंधलकों में खो जायें. भिलाई इस्‍पात कारख़ाने के बाहर चाय की गुमटी लगानेवाले किसी सीनियर, ‘ओल्डियर’ शंकर गुहा नियोगी समर्थक के हाईस्‍कूल फेलियर छोकरे रंजीत कुमटी के मुंह से बहुत बरसों बाद दक्षिण दिल्‍ली के बेर सराय क्षेत्र में अनमने सुनने को मिले, ‘बड़का लोकन से उलझके का होता है, मास्‍टर? लैफ़ का लंगी लगत है, इतिहास का काया-कलप कौनो थोड़े होता है?

कल्पित समुदाय’ के अमरीकी रचयिता बेनेडिक्‍ट एंडरसन अपने इरानी प्रकाशक से पूछें हमारी रचना का चीनी, कोरियाई अनुवाद आ गया, ठीक है, मगर मान्‍यवर, नेपाली और मणिपुरी में कब आएगा? कुनैन की कड़वाहट मुंह में लिए इंटरनेट की नाव पर सवार आगरा का हिन्‍दी प्रकाशक नवीनमोहन प्रामाणिक आंख मूंदे जाने कितनी सदी पीछे लेटे, एक ऊजबक दिखते भले अंगरेज से टकरा जाये, और टकाराते ही एकदम फैल जायें, ‘अच्‍छे अदम स्मिथ हो, खामखा हमारा पुश्‍तैनी प्रकाशन खा रहे हो, मथुरा में रहते तब देखता अर्थव्‍यवस्‍था देखते-देखते कितनी आसानी से कबिता भी बना रहे हो?’